दोषी कौन..?? क्या फायदा हुआ जान पर खेलने का , जब शिक्षक ही नहीं पहुंच रहे स्कूल

पलामू

मनातू शिक्षा है अनमोल रतन, पढ़ने का सब करो जतन, ये महज एक नारा मात्र बनकर रह गया… जिसे जगजाहिर कर दिया पलामू में तैनात सीआरपीएफ 134 वीं बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट संजीत कुमार ने… जब नक्सलियों को अपने जान पर खेल खदेड़ दिया ताकि मनातू जैसे सुदुरवर्ती बीहड़ इलाके में शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी सुविधा का लाभ महकमा पहुंचा सके… पर मनातू के दुर्गम डुमरी पंचायत अंतर्गत केदल स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय में पहुंच अरमानों पर ही पानी फिर गया, जब स्कूल से शिक्षक नदारद, एक शिक्षिका मनोरमा शर्मा थी भी, बावजूद शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति भरी व्यवस्था दिखी… सोचा होगा हम जिन बच्चों के लिए अपनों बच्चों का परवाह ना करके जान पर खेल शांति बहाल कर रहें हैं… उसका फायदा यहीं के नौनिहालों को नहीं मिल पा रहा है, जब इन्हें देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का नाम तक नहीं पता, दुखद है जब मुख्यमंत्री को भी नहीं जानते उत्क्रमित मध्य विद्यालय केदल के छात्र… भला जाने भी कैसे, विद्यालय के सचिव कहें, प्रभारी कहें, प्राचार्य कहें या शिक्षक, एक का तो बीआरसी से लेकर सरकारी दस्तावेज में ही दिन, सप्ताह क्या महीना निकल जाता होगा, बाकी बचा भी समय तो इतना बहाना क्या कम है… रही बात शिक्षक विनोद कुमार यादव का तो संजीत कुमार को इतना ही ज्ञात हुआ कि वो जनाब सरकार के नुमाइंदे नहीं… अपने मन के मालिक है… आना जाना तो बस अपना राज है… आवेदन किसको देना है… ।

मुखिया जी भी बड़े दुखिया निकले, पहले तो धौंस भरा हिदायत पहले दिए की जहाँ बात कही, वहीं ये भी कह डाला कि आदत में सुधार नहीं हो रहा है, तो मुखिया विशुनदेव सिंह का होना नहीं होना बेमलब का है…।

लाखों के बने भवन, लाखों का वेतन, मध्याह्न भोजन, किताब, ड्रेस सबके बाद भी बदहाली का ये आलम यूं ही नहीं है… इसके पीछे जिम्मेदार लोगों का जवाबदेही से भागना क्यों नहीं माना जाए, तब जब बीइइओ यानि प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी सुरेश चौधरी से मुखिया ने भी शिकायत की बात कही, और मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कॉल तो रिसीव नहीं किया कॉल बैक भी नहीं किया… वैसे उनका इतिहास भूगोल भी नागरिक शास्त्र का मैडल पहनाने लायक नहीं ही है… सीआरपी, बीआरपी से लेकर कई मामले विवादित भी हैं…

इतने में तो जवानों को कमान संभाले डीएसपी संजीत कुमार को हाल समझ में आ ही गया बाकी बचा खुचा ग्रामीणों ने सुना डाला… मतलब साफ था, नौनिहालों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है… एल आरपी पर निकले थे, पर ऑपरेशन स्कूल पर फोकस कर आखिरकार संजीत साहब बन गए गुरूजी, हथियार रख उठाया चौक डस्टर… और पढ़ाने लगे रूचिकर पाठ… पर विद्यालय के सुधार के लिए प्रखंड विकास पदाधिकारी रवि प्रकाश को सुचना दी गई… जिन्होंने शिक्षा में लापरवाही बर्दाश्त नहीं करने का, और कारवाई का भी भरोसा दे दिया… पर एक सवाल का जवाब दे दीजिए साहब जनप्रतिनिधियों और सरकारी तंत्र का तमाम तामझाम, उपर से पिकेट से लेकर इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान, फिर भी ये आलम… कोसने से अच्छा है… कुछ कर गुजरा जाए असिस्टेंट कमांडेंट संजीत कुमार की तरह।।

सेवानिवृत्त होने के बाद भी समाज में अपने योगदान से नामचीन बन चुके पलामू के पूर्व सैनिकों और झारखंड एनसीसी के 44 वीं बटालियन ने संयुक्त तौर पर उन्हें अपना सर्वस्व न्योछावर करने पहुंचे जिन्हें दरकार मात्र प्यार, दुलार, अभिमान का है…। जी हम बात कर रहे हैं पलामू जिला आवासीय दिव्यांग विद्यालय का… जहाँ के बच्चों के कायल हो गए हैं..

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