परमात्मा प्राप्ति का विज्ञान है विहंगम योग : संत प्रवर

लातेहार

चंदवा : विहंगम योग परमात्मा प्राप्ति का संध्याकालीन मंचीय सत्र में संत प्रवर जी की संगीतमय स्वर्वेद दिव्यवाणी के द्वितीय दिवस में भी हजारों लोगों ने भाग लिया। संत प्रवर जी ने कहा कि विहंगम योग परमात्मा प्राप्ति का विज्ञान है। आत्मा के कल्याण का साधन है। यह लोक से लेकर परलोक के कल्याण का मार्ग है। अध्यात्म प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। यह सेवा, साधना और सत्संग से प्राप्त होता है। यह अंत: शुद्धि का मार्ग है। यदि भीतर से आध्यात्मिक बल नहीं है तो बाहर की छोटी सी गड़बड़ भी हमें विचलित कर देती है।

अध्यात्म हमें अंदर से स्थिर कर देता है। आनन्द प्रदान कर देता है। हम बाहर की कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते। विहंगम योग में गृहस्थ संत भी घर-परिवार में रहते हुए भी मन-वचन-कर्म से तपस्वी हो सकता है। सद्गुरु की प्रसन्नता में हमारा कल्याण है। स्वर्वेद के प्रचार में ही सदगुरु की प्रसन्नता है। स्वर्वेद का एक-एक दोहा हमारे जीवन का मंत्र बन जाता है। ये वाणियां हिमालय योगी की अनुभव वाणियां हैं।

अध्यात्म के मार्ग में सेवा सबसे बड़ा गुण है। यह हमें भीतर से पवित्रता प्रदान करता है। संध्याकालीन सत्र में ही सद्गुरु आचार्यश्री स्वतंत्रदेव जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी में बतलाया कि वर्ष 1888 ई0 में बलिया के पकड़ी ग्राम में अवतरित अनन्त श्री सद्गुरु सदाफलदेव जी महाराज ने विश्व भर में ब्रह्मविद्या विहंगम योग द्वारा एक लाख जीवों को जन्म मरण के चक्र से छुड़ा देने का संकल्प लिया है।

गुरु और सद्गुरु में अन्तर होता है। सद्गुरु ईश्वरीय सत्ता है। वह आत्मा का गुरु है। विहंगम योग के अन्दर एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा सद्गुरु की तार-धार द्वारा शिष्य आंतरिक अनुभव से जुड़ जाता है। कार्यक्रम में लगाये गए विशाल पंडाल में लातेहार, रांची, लोहरदगा सहित कई जिलों के शहरी एवं सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों से लगभग 10,000 लोग शामिल हुए थे। स्वर्वेद अन्ताक्षरी में कई जिलों के लोगों ने भाग लिया। दो दिवसीय कार्यक्रम में हजारों-हजार श्रद्धालुओं ने भण्डारा, नि:शुल्क चिकित्सा समेत अन्य सेवाओं का लाभ लिया।

हिमालय कन्दरा रचित स्वर्वेद महाग्रंथ सहित आश्रम के 150 से अधिक सद्ग्रंथों एवं कार्यक्रम के सफल आयोजन में विहंगम योग जिला संयोजक श्री विष्णुदेव प्रसाद, मिथिलेश, राज्य समन्वयक डॉ. पंकज दुबे, अध्यक्ष आर के सिन्हा, आश्रम व्यवस्थापक सोमेश्वर टाना भगत, पमुख सह संयोजक नवाहिर उरांव, अनुप पाठक, संयोजक विजय प्रसाद, बद्री प्रसाद, उमेश प्रसाद, प्रचारक पूरण प्रजापति, संजय पासवान, यज्ञ नारायण वैद्य समेत सद्गुरु भाई – बहन व अन्य का सराहनीय योगदान रहा।

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