माँ को भी नहीं छोड़ा

पलामू

आ रही है सरस्वती मईया, अश्लील गानों से शुरू हुई पुकार

सरस्अती जय जय… ये शब्द भले ही कमजोर पड़े हैं मगर बसंत पंचमी की धूम पलामू समेत पूरे देश में मची है। हर गली-मुहल्ले में संगीत से गुंजयमान हो रहा हर इलाका सरस्वती पूजा महोत्सव की धमक जता रही है।

पर ये क्या… कभी जय-जयकार से गुंजने वाला पूजा महोत्सव में गानों की बहार ऐसे हिलोरे मार रही जैसे कहीं स्वचछंद मनोरंजक कार्यक्रम चल रहा हो। समझ नहीं आयेगा सुनकर कि विद्यादायनी को चार बोतल वोदका पीकर उपासना की जा रही है या फिर पीयवा से पहले हमार रहलू कह कर अराधना की जा रही है। जबकि गौरतलब है कि प्रशासन की ओर से सदर एसडीओ ने अश्लील गाने, और वो भी तेज आवाज में बजाने पर पूर्णतः पाबंदी लगा दी गई है… पर गली-गली में मनाए जाने वाले सरस्वती पूजा महोत्सव की धाक तो बढ़ी मगर नहीं बची तो साख।

ये कहाँ तक जायज है… और कौन जिम्मेवार है बहकते कर्णधारों, बिगड़ते विद्यार्थियों को लेकर…। बड़ी आसानी से ये ठीकरा प्रशासन पर तो फोड़ दी जाती है पर उनको ख्याल नहीं है जिनके बच्चे परंपरा को दुलअती मार आज पूजा में खेलवाड़ कर रहे हैं। आज जहाँ अपने आंगन, गली, मुहल्ले में ये डीजे की कर्णभेदी साउंड में अश्लीलता का नंगा नाच कर रहे हैं वहीं कल के आए दिन वो बड़े-बुढ़ो का सम्मान करना भी भूल जाऐंगे, जिसके दोषवार भले ही उन्हें कहा जाएगा पर वो नहीं ब्लकि अभिभावक होंगे जिनके घर के बीच पूजा के बहाने नियम-कानून को छोड़िए इज्ज़त-मर्यादा का सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। यहाँ इस बात का भी जिक्र करना जरुरी है कि क्या चंदा देकर पूजा करवाने वालों को सवाल नहीं पूछना चाहिए कि ये भद्दे-भद्दे गानें बजाने के लिए ही पैसा लिया था, मनोरंजन के नाम पर पूजा के बहाने बेहूदगी दर्शाना समाजिकता को धाराशायी करने का आगाज है , जिसे समय रहते बंद नहीं कराया गया तो फिर नशेड़ी, बलात्कारी, गुंडे, मव्वाली से सुरक्षित समाज की कामना बेकार है।

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