कोर्ट ने बकोरिया एनकाउंटर पर जताया संदेह, कहा- CID ने जांच की रफ्तार रखी धीमी

पलामू

पलामू : बहुचर्चित बकोरिया मुठभेड़ मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कई सवाल उठाए हैं. 23 पन्ने के फैसले में सीआईडी के अनुशंसा के कई बिंदुओ को हाईकोर्ट ने गलत ठहराया है. फैसले में कोर्ट ने लिखा है कि सीआईडी ने 12 मौतों की जांच से जुड़े मामले की रफ्तार धीमी रखी है. इससे पहले बकोरिया जांच को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने भी सवाल किए थे.

सीआईडी एडीजी एमबी राव के दौरान केस के अनुसंधान में तेजी आई थी. 8 सितंबर 2017 को उन्होंने बकोरिया मुठभेड़ का सुपर विजन किया था और घटना से संबंधित अधिकारियों को शहीद घोषित किया था, लेकिन उनका तबादला 13 सितंबर 2017 को कर दिया गया. कोर्ट ने फैसले में जिक्र है कि किसी भी अधिकारी का तबादला कभी भी किया जा सकता है. हालांकि सीआईडी के एडीजी एमबी राव के तबादले का वो सही समय नहीं था.

हाईकोर्ट ने कई बिंदुओं पर किया सवाल

बकोरियाकांड को लेकर पुलिस ने जो तस्वीर कोर्ट में पेश की थी उसमें कहा था कि 12 शव एक साथ थे, जबकि उन्होंने पहले दावा किया था कि सभी शवों की अलग-अलग जगहों पर बिखरे होने की बात थी. हालांकि घटना के आसपास खून के धब्बे नहीं मिलने से कोर्ट ने आश्चर्य जताया. कोर्ट ने सवाल किया कि अगर गोली लगने से सभी की मौत हुई थी तो फिर वहां खून के धब्बे क्यों नहीं थे.

10 लोगों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं

मुठभेड़ में मरने वाले 12 लोगों में से 10 का कोई अपराध का रिकॉर्ड नहीं था, जिसमें 5 नाबालिग थे. कोर्ट ने इस पर भी संदेह जताया. विभाग के ही दो ऑफिसर सीआरपीसी की धारा 161 के तहत डीआईजी हेमंत टोप्पो और सदर थाना के थानेदार हरीश पाठक ने भी मुठभेड़ को फर्जी बताया था, लेकिन गवाह को पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया गया था.

पुलिस ने दावा किया था कि मुठभेड़ के दौरान स्कॉर्पियो गाड़ी के अंदर से भी फायरिंग हुई थी. सीआईडी ने इस दावे की जांच में सही पाया, लेकिन कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर स्कॉर्पियो के अंदर से फायरिंग हुई हो तो उसके अंदर से कारतूस के खाली खोखे क्यों नहीं मिले?

कोर्ट ने मुठभेड़ पर संदेह जताया

पलामू और लातेहार जिला काफी नक्सल प्रभावित है. ऐसे में किसी नियोजित अभियान की जानकारी किसी एक जिले के एसपी को क्यों नहीं दी गई. इस पर भी कोर्ट ने सवाल उठाया. कोर्ट ने मुठभेड़ के फर्जी होने पर संदेह जताया.

बता दें कि पलामू में 8 जून 2015 को यह घटना हुई थी. घटना की जांच सीआईडी करीब 3 सालों तक करती रही, लेकिन इस दौरान कॉल डीटेल्स तक नहीं निकाला गया. घटना के लिए सबसे अहम सबूत कॉल डीटेल्स होता है ताकि घटना के वक्त मौजूद अपराधियों का पता लगाया जा सके. सीआईडी ने सीडीआर निकालने के लिए करीब 2 साल बाद मोबाइल कंपनी को पत्र भेजा, लेकिन कंपनी ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि एक साल पुराना डाटा नहीं दे सकते.

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