पलामू : 1 करोड़ के इनामी नक्सली सुधाकरण ने पत्नी नीलिमा के साथ किया सरेंडर

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पलामू : भाजपानीत रघुवर सरकार के हिस्से बड़ी उपलब्धी आई है. जिनके कार्यकाल में झारखंड पुलिस के दबाव नीति के सामने नक्सलीयों का सबसे बड़ा नाम कानून के सामने घूटने टेक दिया. नक्सल नाम के नामोनिशान मिटाने के संकल्प को बल मिल गया. सुधाकरण ने सरेंडर कर दिया. 

जी हां, झारखंड माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के सदस्य सुधाकरण ने अपनी पत्नी निलिमा के साथ सरकार के सामने सरेंडर कर दिया है. सुधाकरण पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित है. वहीं नीलिमा के सर 25 लाख रुपये का इनाम है. दोनों ने तेलंगाना में सरेंडर किया है. पुलिस ने फिलहाल इसकी औपचारिक पुष्टि नहीं की है.

झारखंड पुलिस के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक नक्सली सुधाकरण और उसकी पत्नी ने दो दिन पहले ही तेलंगाना में सरेंडर कर दिया है. बावजूद झारखंड पुलिस और तेलंगाना पुलिस ने फिलहाल इसकी औपचारिक पुष्टि नहीं की है.

आपने नाम तो सुना होगा पर अब आप विशेष रूप से जानना चाहेंगे कि कौन है सुधाकरण :-

तो कैपिटल एक्सक्लूसिव खबर में हम आपको बता रहे हैं कि सुधाकरण माओवादियों की सेंट्रल कमेटी का सदस्य है. सुधाकरण को ओगू सतवाजी, बुरयार, सुधाकर और किरण सहित कई नामों से जाना जाता है. तेलंगाना के अदिलाबाद का रहने वाले नक्सली सुधाकरण पर एक करोड़ का इनाम घोषित है. अपनी नक्सल गतिविधियों के बदौलत सुधाकरण ने झारखंड में अकूत संपत्ति जमा कर रखी है. गृह विभाग के आदेश पर पुलिस ने झारखंड में एकमात्र सरदर्द बने बूढ़ा पहाड़ के 29 कुख्यात नक्सलियों पर पांच लाख रूपये से लेकर एक करोड़ तक इनाम की घोषणा की थी. इनमें नक्सली नेता सुधाकरण पर एक करोड़ और उसकी पत्नी नीलिमा पर 25 लाख रूपये का इनाम रखा गया था, जो कि तेलंगाना के वरांगल की रहने वाली है.

सुधाकरण अपनी पत्नी के साथ कोयल-शंख जोन में बेहद सक्रिय रहा है. इस जोन में केंदु पत्ता ठेकेदारों और सरकारी योजना में काम करने वाले ठेकेदारों से सुधाकरण ने लेवी की मोटी रकम वसूली है. आतंक के बल पर वसूले गये इस पैसे को सुधाकरण ने अपने दोस्त सत्यनारायण रेड्डी के जरिये कारोबार में भी लगाना शुरू कर दिया था. नक्सली अरविंद जी की मौत के बाद सुधाकरण ही झारखंड-छतीसगढ़ में माओवादियों का नेतृत्व कर रहा था. एनआइए ने सुधाकरण और उसकी पत्नी नीलिमा को भगोड़ा घोषित कर रखा था. पुलिस को कई मामलों में उसकी तलाश थी. लातेहार ब्लास्ट मामले समेत बूढ़ा पहाड़ को नक्सली गढ़ अब तक बनाए रखने में सुधाकरण राह का बड़ा रोड़ा था, जिसके आत्मसमर्पण के बाद माओवादियों को बड़ा झटका ही नहीं लगेगा, नेतृत्व का अभाव भी रहेगा.

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