एक ASI ने ऐसा क्या किया की तीनों बेटे बने दरोगा

गढ़वा

घर में थी कभी रोजगार के लाले, अब एक साथ तीन लाल हुए पुलिसवाले। जी, एक एएस आई के तीन बेटे एक साथ दारोगा  बन कर ऐसा किर्तीमान बनाया, जिसने भी सुना जाना वो भौंचक रह गया, और साधूवाद दिया। ये है भाइयों का स्नेह एवं साथ जिसने सफलता की राह खोल ही नहीं दी बल्कि कहा जा सकता है कि परचम भी फहराया जिसका पताका पलामू समेत झारखंड में लहरा रहा है। दर असल ये वाक्या हुआ है पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर स्थित बारालोटा में। जहां कोडरमा में पदास्थापित अगस्त दूबे की प्रेरणा एवं उनकी अर्धांगनी इंदू देवी का संस्कार उनके तीनों लाल नितेश, बिकेश एवं ऋषिकेश को दारोगा बहाली में कामयाबी दिलाई।

लगन  का लगान जब मिलता है, तो एक वक्त ऐसा आता है, जो मेदनीनगर के बारालोटा स्थित अगस्त दुबे के घर आया है। पलामू से सैकड़ों मील दूर कोडरमा में एएसआई के पद पर समाज को सुरक्षित रखने का बीड़ा उठाये अगस्त दुबे ने, जिंदगी तो वर्दी में बिता दी,  पर यह नहीं सोचा था की उसके तीन बेटे एक साथ उसी वर्दी को पहन लेंगे, और वह भी उस पद पर जहां उन्हें ही सर उठा सैल्यूट मारना पड़ेगा । इससे बड़ा अभिमान की बात एक पिता के लिए क्या हो सकता है।

एक घर चार दारोगा

गढ़वा के बनपुरवा गांव निवासी अगस्त दुबे ने अपने पुलिस की नौकरी के बदौलत 20 साल पहले शहर से दूर बेहद पिछड़े इलाके में घर बनाया था । ताकि बच्चे अच्छे से पढ़ कर अपने पैर पर खड़े हो जाएंगे। भले ही वह पलामू के पौराणिक व सबसे अधिक महता पाये जीएलए कॉलेज के बगल में था।  मगर था सुनसान सा डरावना इलाका।  ऐसे में अगस्त दुबे की धर्मपत्नी इंदु देवी ने अपने कंधों पर बेटों के परवरिश का बोझ उठाया । जिसका परिणाम अनोखा, अद्भुत , अद्वितीय मिला है।  तीनों बेटे एक साथ जो दारोगा बन गए।

तीनों दारोगा भाइयों में बड़ा नितेश दूबे, नाम से तो सोनू पर जिम्मेदारी बड़ी थी, और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद नौकरी भी ठुकराई। वजह था असंतोष, पर नितेश के माता-पिता ने बेटे पर कभी कोई दबाव नहीं डाला। यही वजह था कि सिविल की नौकरी की चाहत रखने वाले समाज में पुलिस की नौकरी नितेश को रास आई जहां शोहरत है, सेवा है, संतुष्टि है।

दूसरे नंबर का बिकेश दूबे भी पिता की चाहतों को पूरा करने घर से दूर निकल पढ़ने गया, रांची रहकर कंप्टीशन की तैयारी शुरू की, मगर लगन भाई के साथ मिलकर उस मौके को भूनाना था, जो उसी विभाग का आया जो रग रग में खून की तरह दौड़ रहा है। तभी तो मोनू को ना नक्सलीयों का भय है नाही अपराधियों का अब तो फर्ज के राह पर चलकर समाज को सुरक्षित बनाना है।

वहीं छोटा होकर भी भाइयों के साथ छोटू उर्फ ऋषिकेश दूबे ने बड़ा धमाका किया, महज बाइस साल की उम्र में ही उसने पुलिस की नौकरी वो भी दारोगा के पद को पाकर अपने लिए सफलता के सारे दरवाजे खोल लिए। उसके लिए तो बड़े भाईयों का प्यार, दुलार एवं सरोकार ही कामयाबी की कुंजी है। जिनके मार्गदर्शन से उसने कम उम्र में मुकाम पा लिया है। बनपुरवा से लेकर मेदिनीनगर तक इस परिवार की कामयाबी की चर्चा हर किसी के जुंबा पर है, चाहे पलामू हो या गढ़वा दोनों जिला इन भाइयों की सफलता पर गौरवान्वित हो रहा है। हो भी क्यों नहीं जन्मभूमि गढ़वा के बनपुरवा में है, तो शिक्षा दीक्षा पलामू जिला मुख्यालय में। कैपिटल न्यूज से बातचीत में तीनों भाईयों के जुबां पर एक नाम हमने सबसे ज्यादा सुना, वो नाम है बनपुरवा में निवास करते नितेश, बिकेश, ऋषिकेश के चाचा सतेंद्र दूबे का। ढेना गुरूजी के नाम से प्रचलित सतेंद्र दूबे का आर्शिवाद मार्गदर्शन का बेहद श्रेय मानता है पूरा परिवार, जिनके हौंसलों ने कामयाबी की इबारत लिखी। जिन्होनें पराक्रम के लिए हिम्मत लगन की सीख और कर्तव्य का बोध कराया।

इन बूढ़ी आंखों की रौशनी बढ़ गई है, इनकी अब उम्र बढ़ गई है। बुढ़ापा सुखद हो गई है, हो भी क्यों नहीं दीपकली देवी एक साथ तीन दारोगा की दादी जो बन गई है। हमेशा बेटे का दारोगा बनने के इंतजार करती नितेश की दादी के लिए इतराने का वक्त आया है। बेटा तो अब एक साल बाद दारोगा बन ही जाऐंगे पर अब पोते वो भी तीन दारोगा बन गए हैं। कैपिटल न्यूज के कैमरे पर दारोगा बनने की वास्तविक खुशी तो दादी दिपकली देवी के चेहरे एवं जुंबा से ही झलकती है।

पति से दूर खुद को आधार बना इंदू देवी के लिए ये वक्त गौरव का है। जिन्हें हर वक्त बेटों के भविष्य की चिंता रहती थी, बिगड़ने का, बहकने का उम्र जो था, लेकिन खुद के संस्कार पर भरोसा था, बाकी भगवान की कृपा मानती है। जिससे आंगन में खुशहाली का वाश होगा। जिंदगी सुखद, सुरक्षित होगी।

अगस्त दूबे ने सोचा भी नहीं था कि जिस वर्दी को अपने शरीर पर डाले रखा, वही वर्दी अब घर के हरेक सदस्यों के तन पर होगी। अब तो पुलिसिया रौब नहीं रंग होगा। घर में रौनक ही रौनक होगा। भले ही साथ हो या ना हो, पर जिंदगी खुशहाली के साथ बितेगा। लगन, परिश्रम, सही मार्गदर्शन तीनों सगे भाईयों को कामयाबी दे दी, और पलामू को बड़ी सीख।

तीन भाई हैं, तीन रंग के
जुड़ा एक ही नाम,
एक साथ मिल, पा गये जग में
परिवार, समाज में सम्मान।

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