कन्या भ्रूण हत्या :- एक गंभीर सामाजिक मुद्दा | Capital News Palamu
Title  कन्या भ्रूण हत्या :- एक गंभीर सामाजिक मुद्दा
कन्या भ्रूण हत्या :- एक गंभीर सामाजिक मुद्दा
Namita Priya


कन्या भ्रूण हत्या को समझने से पहले हमें ये समझना होगा कि भ्रूण कहते किसे हैं। मानव शरीर में , प्राणी के विकास की प्रारंभिक तीन महीने की अवस्था को भ्रूण कहते हैं, जिसे इंग्लिश में एंब्रियो भी कहते हैं। कानूनी प्रक्रियाओं को ताक पर रख कर ,जब मां के गर्भ में पल रहे शिशु को लिंग परीक्षण के उपरांत गर्भ में ही आधुनिक तकनीकों के माध्यम से ख़त्म कर दिया जाता है , तो इसे ही भ्रूण हत्या कहते हैं। चाहे हम जितनी बड़ी बड़ी बातें कर लें पर आज भी हमारे देश के ज्यादातर हिस्सों में लड़कियों को बोझ ही समझा जाता है और लिंग परीक्षण का मुख्य उद्देश्य ही यही होता है कि गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग का पता चल सके और अगर गर्भ में लड़की पल रही हो तो उसे उसी वक़्त ख़त्म कर दिया जा सके। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में रहने वाली मधुमति दो लड़कियों की मां बनने के बाद ,जब तीसरी बार गर्भवती हुई तो उसने भ्रुण परीक्षण कराया। ये पता लगने पर की उसके गर्भ में फिर से एक कन्या पल रही है ,उसने भ्रूण हत्या करवाया। भ्रूण हत्या की यह प्रक्रिया उसने इस उम्मीद के साथ आठ बार दोहराई ताकि वो एक बेटे की मां बन सके। ये कहानी सिर्फ दिल्ली कि मधुमति की ही नहीं है ,बल्कि अगर आप अपने ही समाज या परिवार में नजर डालेंगे तो ना जाने कितनी मधुमति आपको अपने ही आस पास मिल जाए। अब मैं साथ ही साथ आपको ये बताते चलूं की यदि आप विज्ञान कि माने तो लड़के या लड़की का होना सिर्फ पुरुषों के जीन के आधार पर ही निर्धारित होता है पर एक बेबुनियाद सामाजिक भ्रांति का दंश आज भी महिलाओं को ही झेलना पड़ रहा है। आज भी देश के कई हिस्सों में लड़कियों को जन्म देने वाली माताओं को बहुत ही हीन दृष्टि से देखा जाता है, जिसमें उनकी कोई गलती दरअसल होती ही नहीं है। एक अनुमान के अनुसार भारत में पिछले दस सालों में करीब डेढ़ करोड़ लड़कियों को जन्म से पहले मार दिया गया या फिर जन्म लेने के छह वर्षों के अंदर ही उनको मौत के मुंह में धकेल दिया गया। 2011 की जनसंख्या जनगणना के अनुसार हमारे देश का लिंगानुपात 1000/943 अर्थात हर एक हजार लड़को कि संख्या पर लड़कियों की संख्या सिर्फ नौ सौ तैतालिस है। 2001 की जनगणना में महिलाओं की संख्या हर एक हजार पुरुषों कि तुलना में सिर्फ 933 थी। चाइल्ड सेक्स रैसियो या बाल लिंगानुपात के अन्तर्गत 0 - 6 वर्ष के बच्चों की गणना की जाती है , जिसमें प्रति एक हजार बालकों कि संख्या पर बालिकाओं की संख्या की तुलना की जाती है। हमारे देश का बाल लिंगानुपात का आंकड़ा बेशक डराने वाला है। 1981 में प्रति 1000 लड़को पर 962 लड़कियां थी , जबकि 1991 में इनकी संख्या 945 हो गई , वहीं 2001 और 2011 में इनकी संख्या कम हो कर क्रमशः 927 व 919 पर पहुंच गई हैं। अब 2021 में होने वाले जनसंख्या जनगणना में ये देखना अति महत्वपूर्ण होगा कि सरकार के अथक प्रयास इस खाई को कम करने में कारगर सिद्ध हुए या सारी योजनाएं धरी की धरी रह गई। हालांकि वर्तमान स्थति को देखते हुए परिणाम का अंदाजा लगाना इतना भी मुश्किल नहीं है ,पर बेशक 2021 में होने वाले जनगणना में सकारात्मक परिणाम की हम सब को उम्मीद है। जन्म के पहले लड़कियों को मारने की प्रथा भारत में महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव , लैंगिक जांच कराने की तकनीक आने के साथ ही शुरू हो गई थी। इस प्रकार के परीक्षण अल्ट्रासाउंड के जरिए भी किए जा सकते हैं। कुछ डॉक्टरों ने ऐसे विज्ञापन भी लगवाए ,जिन पर लिखा था - आज 500 रुपए खर्च कीजिए , कल दहेज के 5 लाख रुपए बचाईए। जब जान बचाने वाला ही चंद पैसों की लालच में जान लेने पर उतर आए फिर किसी और कि बात ही क्या की जाए। भारत में लिंग अनुपात में गिरावट को ध्यान में रखते हुए पी सी एंड पी एन डी टी अधिनियम ( Pre - conception and Pre - natal Diagnostics Techniques - PC and PNDT Act) 1994 लागू किया गया। इस पद्धति का मुख्य उद्देश्य है लिंग चयन तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना। इस एक्ट को 2003 में पुनः संशोधित कर इस अधिनियम के दायरे में लिंग परीक्षण के पूर्व अवधारणा तथा अल्ट्रासाउंड तकनीक को भी शामिल किया गया। हम खोखली सकारात्मक सोच के नाम पर कड़वी सच्चाई को तो बिल्कुल नकार नहीं सकते। सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना होगा कि हमारे समाज में लड़कियों को लेे कर एक नकारात्मक सोच बनी हुई है , जिसे मैं मानती हूं की एक झटके में किसी जादू से खत्म करना मुमकिन नहीं है। मुझे लगता है हर इंसान को जागरूक कर पाना भी मुमकिन नहीं है , पर सरकार के द्वारा नियमों को शख्ती से लागू जरूर करवाया जा सकता है। चाहे बात लिंग परीक्षण की हो या लड़कियों के शोषण की या फिर मैं बात करूं दहेज प्रथा की या महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले किसी भी तरीके की हिंसा कि , अगर इन सारे मुद्दों पर बनाए गए कानून को सरकार के द्वारा गंभीरतापूर्वक लागू किया जाए तो मुझे नहीं लगता कि फिर लोग लड़कियों के जन्म से इतने आतंकित होंगे। संविधान के नियमों का सिर्फ लिखा होना काफी नहीं है , महत्वपू्ण इसका क्रियान्वयन है ,तभी एक स्वस्थ और सुदृढ़ समाज की कल्पना मुमकिन है।


Palamu, Latehar, G...
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13-10-2020